एक वक़्त था ।
नेता शब्द सोचते ही
गाँधी,सुभाष,नेहरू,कलाम
याद आते थे.
सिर झुक जाता था ,श्रद्धा से।
आज वक़्त है,
नेता शब्द सोचते ही
मुख्तार,लालू,अमरमणि,शाहबुद्दीन
याद आते हैं.
सिर झुकता है,आज भी
पर,शर्म से.
सच,वक़्त बदल गया है,
बदल गया है,नेता का अर्थ भी
नेता का नाम,सम्मान से नही
अब ,गाली देकर लेने का
मन करता है,
मन करता है बुलाऊ गाँधी को
एक बार फिर धरती पर,
देखें अपनी आँखों से
क्या यही है,
उनके सपनों का भारत ?
Wednesday, November 21, 2007
Saturday, November 3, 2007
मैं और मेरा सफर

मैं आज़ाद भारत मॆं janma– १९ अगस्त १९५०. जन्म से राजकुमार.फिर, बना वियोगी और कविता से लेकर व्यंग लेखों तक,कागज काले किये. अखबारी और साहित्यक राजनीति को करीब से देखा.कुछ सुखद पल भी आये,वेदविद डाक्टर मुंशीराम शर्मा ‘सोम’और unesco पुरूस्कार प्राप्त लेखक शत्रुघ्न लाल शुक्ल का सानिध्य और स्नेह भी मिला.और फिर खुद कि भाग्य रेखाएँ तलाशते,दूसरों कि भाग्य रेखाएँ पढने लगा, और बन गया-राजकुमार रत्न्प्रिय.एक साहित्यकार से ज्योतिषी बनने का सफ़र मुझे तो कुछ अजीब ही लगता है.लकिन लोग कहते हैं-साहित्यकार भी तो हमेशा भविष्य मॆं झाकता ही रहता है,मेरा सफ़र आख़िर ‘सफ़र’ ही है,जो मैं कर रहा हूँ.अब मैं आपको भी अपने साथ सफ़र का हमसफ़र बना रहा हूँ.
रंग-बदरंग
रंग मुझे आकर्षित करते हैं.सूर्योदय और सूर्यास्त के आकाशीय रंग,खिलते फूलों के रंग,उड़ती तितलियों के रंग और ऐश्वर्य से भरेपूरे रत्नों के रंग किसकी आंखों को नहीं भाते,मुझे भी बहुत भाते हैं.
रंगों का संसार जीवन में रंग भर देता है.ज्योतिष में रंगों के विशेष प्रभावों का वर्णन भी है.प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशेष रंग शुभ या अशुभ होता है.कुल मिला कर रंग हमारे जीवन का अंग हैं.
अब बात रंग बदलने कि,रंग बदलना लोग अच्छा नही मानते.रंग लोग बदलते हैं और कहेंगे-गिरगिट कि तरह रंग बदल रहा है.बेचारा गिरगिट अपनी जान बचाने को रंग बदलता है,लोग रंग बदलते हैं अपने स्वार्थ साधने के लिए.दोनो में बड़ा अंतर है भाई.आख़िर नेताओं ,अभिनेताओं और dharmdhawajadhariyon से रंग बदलने वालों कि उपमा क्यों नही दी जाती? आख़िर क्यों?क्या हम रंग बदलने के मामले में बहुत आगे नही हैं?या हम बदरंग ही हैं,केवल बातें ही रंगीन करते हैं.क्या हम सुधर नही सकते?
रंगों का संसार जीवन में रंग भर देता है.ज्योतिष में रंगों के विशेष प्रभावों का वर्णन भी है.प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशेष रंग शुभ या अशुभ होता है.कुल मिला कर रंग हमारे जीवन का अंग हैं.
अब बात रंग बदलने कि,रंग बदलना लोग अच्छा नही मानते.रंग लोग बदलते हैं और कहेंगे-गिरगिट कि तरह रंग बदल रहा है.बेचारा गिरगिट अपनी जान बचाने को रंग बदलता है,लोग रंग बदलते हैं अपने स्वार्थ साधने के लिए.दोनो में बड़ा अंतर है भाई.आख़िर नेताओं ,अभिनेताओं और dharmdhawajadhariyon से रंग बदलने वालों कि उपमा क्यों नही दी जाती? आख़िर क्यों?क्या हम रंग बदलने के मामले में बहुत आगे नही हैं?या हम बदरंग ही हैं,केवल बातें ही रंगीन करते हैं.क्या हम सुधर नही सकते?
Tuesday, October 30, 2007
लाफिंग budhha और भाग्य
आजकल वास्तुशास्त्रियों की बाढ़आई हुयी है.फेंगशुई आदि के परामर्श देने वाले बड़े-बड़े बैनर लगाए हुए हैं.अभी कुछ दिन पूर्व मुझे एक दुखी सज्जन मिले.जेब मैं फेंगशुई के कुछ साधन और जीभ पर लाफिंग budhha से बहुत सी शिकायतें .अपना मकान भी उन्होंने तोड़फोड़ डाला और वास्तु शोधन मैं अच्छा खासा खर्च भी किया.लेकिन सब व्यर्थ,भाग्य नही बदला तो नही ही बदला.यह तो एक कहानी है.ऐसी ही कई कहानियाँ और भी होंगी.मुझे इन लोगों से सहानुभूति है,साथ ही इनकी बुद्धि पर तरस भी आता है।अपने एक लंबे प्रोफेशनल अनुभव में मैंने पाया, कि यदि जन्म पत्रिका मैं grhadosh है,तो वास्तु शोधन और अनेक चीनी-जापानी साधन व्यर्थ ही रहते हैं.जातक को चाहिये कि सर्वप्रथम वह अपने ग्रह दोषों से मुक्ति का निदान करे.बाक़ी प्रयोग बाद में ही करना उचित होगा.शुभ ग्रह स्थितियां अनेक दोषों का स्वयं ही शमन करती हैं.लाफिंग budhha को अपने भाग्य पर ठहाके लगाने का मौका न दें,बल्कि खुद मुस्कराएँ,मैं यही चाहता हूँ.
Tuesday, October 23, 2007
कैसे बात करूं
कैसे बात करूं तनमन की,
मौसम का बदल गया रंग.
लहराये परचम वादों के
गड़े गए संवाद विवादों के.
नुचवाये खुद पंख कपोतों ने,
कैसे बात करूं शबनम की,
मौसम का बदल गया रंग.
तने गा रहे,महल पथरीले.
सिसकेमेड़ों के गीत सुरीले.
बनवाये पिंजरे तोतों ने,
कैसे बात करूं सरगम की,
मौसम का बदल गया रंग.
कूक सीने मे,हाँथ खाली.
जलाए बाग़ खुद,आज माली.
चाह को सताया चहेतों ने-
कैसे बात करूं हमदम की,
मौसम का बदल गया रंग.
मौसम का बदल गया रंग.
लहराये परचम वादों के
गड़े गए संवाद विवादों के.
नुचवाये खुद पंख कपोतों ने,
कैसे बात करूं शबनम की,
मौसम का बदल गया रंग.
तने गा रहे,महल पथरीले.
सिसकेमेड़ों के गीत सुरीले.
बनवाये पिंजरे तोतों ने,
कैसे बात करूं सरगम की,
मौसम का बदल गया रंग.
कूक सीने मे,हाँथ खाली.
जलाए बाग़ खुद,आज माली.
चाह को सताया चहेतों ने-
कैसे बात करूं हमदम की,
मौसम का बदल गया रंग.
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