Saturday, January 12, 2008

क्यों चाहिये आरक्षण ???

हिन्दू धर्म में हो रहे जातीय उत्पीड़न से परेशान दलितों ने धर्म परिवर्तन किया.कुछ मुसलमान बन गये तो कुछ ईसाई.धर्म परिवर्तन करते ही उनका उत्पीड़न समाप्त हो गया और दलित होने का ठप्पा भी.अब तो सब सुख ही सुख होना ही चाहिये. ‘दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे’ गाना गाते हुए उन्हें नित्य आनंद मग्न होना चाहिये.
लेकिन यह क्या हो रहा है?दलित ईसाई,दलित मुसलामानों को आरक्षण का शोर मचने लगा है.आखिर क्यों?धर्म परिवर्तन के बाद जब उनके सारे दुःख-दर्द दूर होने का दावा हो रहा था,फिर आरक्षण की क्या जरूरत?मतलब ,क्या उनके दुःख-दर्द दूर नहीं हुए.मुसलमान,ईसाईयों में भी जातिवाद हावी है?क्या अंतर पड़ा धर्म परिवर्तन का?ऐसे,कई प्रश्न क्या हमें आपको विचलित करने के लिए काफी नहीं हैं…

धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण माँगना बेहयायी और आरक्षण देना हिन्दू समाज के दलितों के साथ अन्याय ही होगा.देश के दलितों को अधिकार है,कि वह अपने साथ हुए अन्याय का मुआवजा समाज से मांगें और लें.लकिन जो दलित मुखोटा उतार कर मुसलमान या इसाई बन चुके हैं,उन्हें समाज से मुआवजा पाने का कोई अधिकार नहीं,क्यों कि वह भेदभाव रहित धर्मों की शरण में जा चुके हैं.आप भी शायद मेरे विचारों से सहमत होंगे! मैं गलत तो नहीं कह रहा हूं?

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लिखायें.मैं भेजूंगा अपनी एक पुस्तक
आपके लिए.

Wednesday, January 9, 2008

तीन एहसास

हवाएं कुछ सर्द होती जा रही हैं.
फिजायें बेदर्द होती जा रही हैं.
आओ करें माहौल थोडा सा गरम-
जेहनी सर्दियां,दर्द होती जा रही हैं.

भरम उतना ही भला,मन बहल जाये.
दर्द कुछ पिघले,घाव कुछ सहल जाये.
पर हदबंदी भी जरूरी है-
दर्द इतना न सहो, कि दम निकल जाये.

अंधेरों में हांथ क्या चलाते हो.
अंधेरा दूंदते हो,उजाला बताते हो.
उजाले चाहिए,आग तो जलाओ-
शोला बनो,क्यों टिमटिमाते हो.

Friday, January 4, 2008

एक और नया साल

आज एक साल जा रहा है,तो दूसरा आ रहा है.दुनिया भर मैं हंगामा मचा है.विशेष आयोजन हो रहे हैं.शराब पानी की तरह बहेगी! नर्तकियाँ एक-एक कर अपना शरीर उघाड़ रही होंगी.लोग मदहोश हो रहे होंगे.नेतिकता की दुहाई देने वाला समाज अपने आप को नंगा होता हुआ देखेगा.वाह क्या कहने…यही है-नए साल का जश्न,यही है नए साल की मस्ती और यही है हमारा ख़ुशी दिखाने का जूनून.
मुझे तो नए और पुराने साल में कुछ भी फर्क नहीं दिखता.मुझे सड़क पर कूड़ा बीनते bache गए साल में भी दिखे और नए साल में भी दिखे.गुंडे नेता बनते, गए साल में भी दिखे और नए साल में भी.
ईमानदारी गए साल में पिटी,नए साल में भी पिटेगी.एक किरण बेदी गए साल में अन्याय का शिकार हुई ,नए साल में भी कोई जरूर होगी.और भी न जाने क्या-क्या होगा जो गए साल में हुआ नए साल में भी होगा.अरे हाँ,लाल किले पर झंडा गए साल में फहराया गया,नए साल में भी फहराया जाएगा.
प्रधानमंत्री लिखा लिखाया मनमोहक भाषण देश की जनता के सामने धकेलेंगे.
और जनता ‘जए हिंद’ का नारा लगाते हुए पेट को मलेगी.पूंजीपति,नेता,गुंडे,नौकरसाह और विदेशी राजनयिक ताली बजायेंगे.और फिर भीड़ जरा भी भड़की तो गोलियां चलाने को तैयार पुलिस भी तो है.कहीं भी नंदीग्राम बनने में देर नहीं लगेगी. बस ऐसे ही पुराने साल जायेंगे,नए साल आएंगे.कोई शराब से नहायेगा तो कोई पानी को भी तरसेगा.कोई मदहोश करने को कपड़े उतारेगा,तो कोई मजबूरी में नंगा रहेगा. क्या ये सब ऐसे ही चलेगा?नए साल ऐसे ही,आएंगे,जायेंगे?
ढंग कुछ तो बदलना चाहिऐ ,बेवजह हँसना भी बेहयाई है!

Sunday, December 9, 2007

एक थे 'एस.सी.' शर्मा

Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा

एक भूली-बिसरी कहानी आज याद आ रही है.लगभग ३०-३५ बरस पहले मेरे एक मित्र हुआ करते थे. नाम था-सुशील चन्द्र शर्मा,लेकिन लिखते थे एस. सी.शर्मा,एक तकनीकी शिक्षा संस्थान मैं विद्यार्थी रहते हुए, अनुसूचित जाति का वजीफा लेते रहे,और हम सब मित्रों की दावतें होती रहीं. मैंने एक बार उनसे कहा-अबे शर्मा तू तो पंडित होकर ये वजीफा कैसे ले रहा है? बोले-भाई मैं ‘एस.सी.’ पहले और शर्मा बाद में हूँ. अरे मेरा नाम भी तो चिल्ला-चिल्ला कर यही कह रहा है. हम सब हँसी के ठहाकों मैं खो गए.उनकी सोच बड़ी तेज लगती थी.
आज मैं अपने उस समय के बचपने को लेकर गंभीर हूँ,और ग़मगीन भी.हम अपने लाभ के लिए कुछ भी कर सकते हैं.अन्धे न होकर भी अंधे होने का नाटक कर सकते हैं.तथाकथित ऊँची जाति के होने पर भी ‘एस.सी’ का बिल्ला लगा सकते हैं.यह सब चिंतनीय है.लेकिन इस सबसे अधिक चिंतनीय है ‘एस.सी’ का लाभ लेना,और जाति कहकर पुकारे जाने पर हंगामा खड़ा करना .एक सवाल-आजा नच ले' के गाने में ऐसा क्या है,कि तूफ़ान बरपा है.अरे भाई राजनीति की रोटियां सेकने के लिए नेताओं को मौक़े की तलाश रहती है.मौका मिला,बस उड़ लिए.आख़िर हम कहाँ जा रहे हैं?नेता देश को कहाँ लिए जा रहे हैं?निश्चय ही गहन चिंतन और सामाजिक बहस की जरूरत है.

Wednesday, November 21, 2007

सिर झुकता है आज भी....

एक वक़्त था

नेता शब्द सोचते ही
गाँधी,सुभाष,नेहरू,कलाम
याद आते थे.
सिर झुक जाता था ,श्रद्धा से।

आज वक़्त है,

नेता शब्द सोचते ही
मुख्तार,लालू,अमरमणि,शाहबुद्दीन
याद आते हैं.
सिर झुकता है,आज भी
पर,शर्म से.

सच,वक़्त बदल गया है,
बदल गया है,नेता का अर्थ भी
नेता का नाम,सम्मान से नही
अब ,गाली देकर लेने का
मन करता है,
मन करता है बुलाऊ गाँधी को
एक बार फिर धरती पर,
देखें अपनी आँखों से
क्या यही है,
उनके सपनों का भारत ?

Saturday, November 3, 2007

मैं और मेरा सफर


मैं आज़ाद भारत मॆं janma– १९ अगस्त १९५०. जन्म से राजकुमार.फिर, बना वियोगी और कविता से लेकर व्यंग लेखों तक,कागज काले किये. अखबारी और साहित्यक राजनीति को करीब से देखा.कुछ सुखद पल भी आये,वेदविद डाक्टर मुंशीराम शर्मा ‘सोम’और unesco पुरूस्कार प्राप्त लेखक शत्रुघ्न लाल शुक्ल का सानिध्य और स्नेह भी मिला.और फिर खुद कि भाग्य रेखाएँ तलाशते,दूसरों कि भाग्य रेखाएँ पढने लगा, और बन गया-राजकुमार रत्न्प्रिय.एक साहित्यकार से ज्योतिषी बनने का सफ़र मुझे तो कुछ अजीब ही लगता है.लकिन लोग कहते हैं-साहित्यकार भी तो हमेशा भविष्य मॆं झाकता ही रहता है,मेरा सफ़र आख़िर ‘सफ़र’ ही है,जो मैं कर रहा हूँ.अब मैं आपको भी अपने साथ सफ़र का हमसफ़र बना रहा हूँ.

रंग-बदरंग

रंग मुझे आकर्षित करते हैं.सूर्योदय और सूर्यास्त के आकाशीय रंग,खिलते फूलों के रंग,उड़ती तितलियों के रंग और ऐश्वर्य से भरेपूरे रत्नों के रंग किसकी आंखों को नहीं भाते,मुझे भी बहुत भाते हैं.
रंगों का संसार जीवन में रंग भर देता है.ज्योतिष में रंगों के विशेष प्रभावों का वर्णन भी है.प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशेष रंग शुभ या अशुभ होता है.कुल मिला कर रंग हमारे जीवन का अंग हैं.
अब बात रंग बदलने कि,रंग बदलना लोग अच्छा नही मानते.रंग लोग बदलते हैं और कहेंगे-गिरगिट कि तरह रंग बदल रहा है.बेचारा गिरगिट अपनी जान बचाने को रंग बदलता है,लोग रंग बदलते हैं अपने स्वार्थ साधने के लिए.दोनो में बड़ा अंतर है भाई.आख़िर नेताओं ,अभिनेताओं और dharmdhawajadhariyon से रंग बदलने वालों कि उपमा क्यों नही दी जाती? आख़िर क्यों?क्या हम रंग बदलने के मामले में बहुत आगे नही हैं?या हम बदरंग ही हैं,केवल बातें ही रंगीन करते हैं.क्या हम सुधर नही सकते?