एक भूली-बिसरी कहानी आज याद आ रही है.लगभग ३०-३५ बरस पहले मेरे एक मित्र हुआ करते थे. नाम था-सुशील चन्द्र शर्मा,लेकिन लिखते थे एस. सी.शर्मा,एक तकनीकी शिक्षा संस्थान मैं विद्यार्थी रहते हुए, अनुसूचित जाति का वजीफा लेते रहे,और हम सब मित्रों की दावतें होती रहीं. मैंने एक बार उनसे कहा-अबे शर्मा तू तो पंडित होकर ये वजीफा कैसे ले रहा है? बोले-भाई मैं ‘एस.सी.’ पहले और शर्मा बाद में हूँ. अरे मेरा नाम भी तो चिल्ला-चिल्ला कर यही कह रहा है. हम सब हँसी के ठहाकों मैं खो गए.उनकी सोच बड़ी तेज लगती थी.
आज मैं अपने उस समय के बचपने को लेकर गंभीर हूँ,और ग़मगीन भी.हम अपने लाभ के लिए कुछ भी कर सकते हैं.अन्धे न होकर भी अंधे होने का नाटक कर सकते हैं.तथाकथित ऊँची जाति के होने पर भी ‘एस.सी’ का बिल्ला लगा सकते हैं.यह सब चिंतनीय है.लेकिन इस सबसे अधिक चिंतनीय है ‘एस.सी’ का लाभ लेना,और जाति कहकर पुकारे जाने पर हंगामा खड़ा करना .एक सवाल-आजा नच ले' के गाने में ऐसा क्या है,कि तूफ़ान बरपा है.अरे भाई राजनीति की रोटियां सेकने के लिए नेताओं को मौक़े की तलाश रहती है.मौका मिला,बस उड़ लिए.आख़िर हम कहाँ जा रहे हैं?नेता देश को कहाँ लिए जा रहे हैं?निश्चय ही गहन चिंतन और सामाजिक बहस की जरूरत है.
